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प्रह्लाद की भक्ति ने किया अत्याचारी कुल का उद्धार

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देहरादून : सिद्धपीठ प्राचीन श्री शिव मंदिर, धर्मपुर चौक में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस कथा व्यास आचार्य अरुण सती जी ने भक्त प्रह्लाद की अटूट भक्ति, भगवान शिव के नीलकंठ स्वरूप और गज-ग्राह प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया। इस अवसर पर कृष्ण जन्मोत्सव भी धूमधाम से मनाया गया।

कथा व्यास ने कहा कि भगवान के नाम और भक्ति में जीवन को बदलने की शक्ति है। भक्त प्रह्लाद की भक्ति के कारण हिरण्यकश्यप जैसे अत्याचारी के कुल का भी उद्धार हुआ। उन्होंने श्रद्धालुओं से भगवान के प्रति अटूट विश्वास रखते हुए भक्ति के मार्ग पर चलने का आह्वान किया।

समुद्र मंथन प्रसंग में उन्होंने बताया कि संसार की रक्षा के लिए भगवान शिव ने समुद्र से निकले विष को अपने कंठ में धारण किया, जिससे उनका कंठ नीलवर्ण हो गया और वे नीलकंठ कहलाए। यह प्रसंग त्याग, करुणा और लोककल्याण की प्रेरणा देता है। वहीं गज-ग्राह प्रसंग के माध्यम से परिवार के महत्व तथा संकट में एक-दूसरे का साथ देने का संदेश दिया।

भगवान श्रीराम के त्याग और भरत के आदर्श चरित्र का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में प्रेम, त्याग, परिवार और मर्यादा का विशेष महत्व है।

कृष्ण जन्मोत्सव के दौरान श्रद्धालुओं ने भजन-कीर्तन और जयकारों के साथ उत्सव मनाया। मंदिर परिसर भक्तिमय वातावरण से गूंज उठा। कथा के उपरांत भोग-प्रसाद वितरित किया गया।

इस अवसर पर समिति के प्रधान सीताराम भट्ट, देवेन्द्र अग्रवाल, दिनेश चमोली, दीपक शर्मा, मदन हुरला, आत्माराम शर्मा, जय प्रकाश बंसल, शरद शर्मा, प्रमोद शर्मा, सुनील कौशिक सहित समिति के पदाधिकारी एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।